दयालबाग आगरा में आयोजित बसंत उत्सव में युवाओं ने दिखाया जिमनास्टिक में दमखम



*ज्योति एस, दयालबाग (आगरा)।* बसन्तोत्सव के उपलक्ष्य में 13 फरवरी मंगलवार को दयालबाग़ में नवयुवकों एवं नवयुवतियों ने जिम्नाटिक्स का बहुत ही उत्तम प्रदर्शन किया। नवयुवक व नवयुवतियों ने कई हैरतअंगेज कारनामें प्रस्तुत किये जिनको देख कर उपस्थितजनों ने मुक्त कंठ व करतल ध्वनि कर उनका उत्साहवर्धन किया।

आज के कार्यक्रम की आकर्षक विशेषता थी कि इसमें दयालबाग़ के सुसज्जित ऊँटों ने भी भाग लिया। नवयुवकों ने भी ऊँटों के ऊपर/साथ भी कई हैरतअंगेज पिरामिड का प्रदर्शन किया। इस सब के दौरान ऊँटों ने भी अनुशासित प्रतिभागी की भांति भाग लिया तथा आनन्दित होते रहे।

जिम्नास्टिक्स प्रदर्शन के दौरान दी गईं प्रस्तुतियों की सूचि संलग्न है।

“तमन्ना यही है कि......” प्रार्थना के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। परमपूज्य हुज़ूर प्रो. प्रेमसरन सतसंगी साहब एवं आदरणीय रानी साहिबा की पूरे कार्यक्रम के दौरान उपस्थिती से प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन हुआ। अन्त में सभी प्रतिभागियों को परशाद वितरित किया गया।

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*दयालबाग़ में बसंत पंचमी*

*“ऋतु बसन्त आये सतगुरु जग में,

चलो चरनन पर सीस धरो री।”*


माघ सुदी पंचमी, जो बसंत पंचमी के नाम से प्रसिद्ध है, आर्य संस्कृति में एक मुबारक (पवित्र) दिन माना जाता है और आनन्द व उल्लास के मौसम का अगुआ समझा जाता है। संतों ने भी मालिक के इस संसार में आने के समय की उपमा ऋतुओं के राजा - बसंत ऋतु से दी है।

आगरा शहर में स्थित दयालबाग़, जो कि राधास्वामी सतसंग का मुख्यालय है, में बसंत का विशेष महत्व है। बसंत पंचमी का दिन राधास्वामी मत के सतसंगियों के लिए महा आनन्द व विलास का है क्योंकि इसी पवित्र दिवस, 15 फरवरी 1861 को, मत के प्रथम आचार्य परम पुरूष पूरन धनी हुज़ूर स्वामी जी महाराज ने जगत उद्धार का संदेश पहले-पहल प्रगटाया और सतसंग आम जारी फरमाया।

“घट में खेलूँ अब बसन्त।

भेद बताया सतगुरु संत।।”

बसंत पंचमी, 20 जनवरी 1915, के दिन राधास्वामी मत के पाँचवें आचार्य, सर साहबजी महाराज द्वारा राधास्वामी सतसंग का मुख्यालय, दयालबाग़, आगरा शहर में स्थापित करने हेतु एक शहतूत का पौधा लगा कर दयालबाग़ की नींव रखी गई। इसके साथ ही नई सतसंग संस्कृति की नींव भी रखी गई। दयालबाग़ में शिक्षा एवं संस्कृति या एक तर्जे़ जिन्दगी (Way of Life) की शुरूआत एक बहुत सुन्दर व कोमल पौधे के रूप में 1 जनवरी 1916 को मिडिल स्कूल, जिसे राधास्वामी एजुकेशनल इन्स्टीट्यूट (REI) के नाम से जाना गया, के रूप में की गयी। यह पौधा धीरे-धीरे बढ़ते हुये वर्तमान में यूनिवर्सिटी (DEI) के रूप में एक बड़ा वृक्ष बन गया है, जिसका प्रभाव न केवल अपने देश के विभिन्न भागों में अपितु विदेशों में भी हो रहा है। दयालबाग़ एजुकेशनल इन्स्टीट्यूट (DEI) नाम के इस वृक्ष की सुगंध चहुँ दिस फैल रही है।

“आज आई बहार बसंत।

उमंग मन गुरु चरनन लिपटाय।।”

बसंत का दिन राधास्वामी मत के सतसंगियों के लिए बहुत महत्व रखता है। इस दिन को सभी सतसंगी अत्यधिक हर्षोल्लास से मनाते हैं तथा हुज़ूर राधास्वामी दयाल का गुणगान करते हैं। 

दयालबाग़ की जीवनशैली सदैव से ही गतिशील एवं गतिमान रही है अतः प्रत्येक वर्ष कुछ न कुछ नए आयाम जुड़ते रहते हैं। इस वर्ष भी 16 दिसम्बर 2023 को दयालबाग़ की गौशाला में राजस्थान से खरीदे गये 5 ऊँटनी व 3 बच्चों के रूप में नए मेहमानों का आगमन हुआ। बाद में 3 ऊँट और जुड़ गये तथा एक ऊँटनी ‘धुन’ ने एक बहुत ही सुन्दर व स्वस्थ बच्चे ‘पराधुन’ को जन्म दिया। यहाँ ये उल्लेख करना भी जरूरी है कि राजस्थान से दयालबाग़ आते हुए एक ऊँटनी ‘सखी’ की टांग में कुछ तकलीफ हो गई थी जिस कारण वो उठ नहीं पा रही थी। आगरा, मथुरा, बीकानेर यहाँ तक कि आस्ट्रेलिया के विशेषज्ञ चिकित्सक निरन्तर उसकी देखभाल एवं इलाज कर रहे थे परन्तु सखी के स्वास्थ्य में उत्साहवर्धक सुधार नहीं हुआ। इसी दौरान परम सन्त परम पिता हुज़ूर प्रो॰ प्रेम सरन सतसंगी साहब निरन्तर सखी के पास जाते रहे एवं अपनी दिव्य दृष्टि से ‘सखी’ को सराबोर करते रहे। परम पूज्य हुज़ूर प्रो॰ प्रेम सरन सतसंगी साहब के आगमन पर ‘सखी’ में भी नई स्फूर्ती पैदा हो जाती थी तथा एक टक परम पूज्य हुज़ूर के दर्शन करती रहती थी, ऐसा प्रतीत होता था कि वो भी उन दयाल से खुद को शीघ्र स्वस्थ करने की विनती कर रही हो। अन्ततः ‘सखी’ की प्रार्थना एवं परम पूज्य हुज़ूर प्रो॰ प्रेम सरन सतसंगी साहब की दया के प्रताप से दिनांक 11.01.2024 को रात 11:20 पर ‘सखी’ एकाएक उठ कर खडी हो गयी तथा अपने आप 8-10 कदम चल कर अन्य ऊँटों के पास चली गई, समस्त सतसंग जगत परम पूज्य दयाल के प्रताप के करिश्में को महसूस कर रहा था। इसी उपलक्ष्य में स्वामी नगर के परिलोक में परम पुरुष पूरन धनी हुज़ूर स्वामी जी महाराज की पवित्र समाध के साये में कुल मालिक के चरणों में शुकराने का जश्न मनाया गया। पवित्र पोथियों से पाठ, कव्वालियां पढ़े गये एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। राधास्वामी मत के आचार्यों की दया का प्रताप किसी से छुपा नहीं है, यह समय समय पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में दिखायी देता है, बस उन दयाल के प्रति ‘सखी’ जैसी आस्था रखनी होती है।

सयुंक्त राष्ट्र संघ ने भी ऊँटों की उपयोगिता को देखते हुए 4 जनवरी 2024 को वर्ष 2024 को ‘अन्तर्राष्ट्रीय ऊँट वर्ष’ घोषित कर दिया है जबकि दयालबाग़ में ऊँटों का आगमन काफी समय पहले ही हो गया है।

बसंत के आगमन के पूर्व दयालबाग में इसके स्वागत की तैयारियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं। छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुज़ुर्गों के उल्लास की सीमा नहीं होती है। अपने घरों तथा मोहल्लों और पूरे दयालबाग़ में सफाई व सजावट में सभी जुट जाते हैं। सभी लोगों के सामूहिक प्रयासों से बसंत के सुअवसर पर दयालबाग़ में एक अनोखी छटा देखने को मिलती है। बसंत के पर्व को सतसंगी अत्यन्त भक्तिभाव पूर्ण रीति से मनाते हैं और अपने परम पूज्य गुरू महाराज के चरनों में राधास्वामी दयाल का शुकराना अदा करते हुए, पूर्ण उमंग व प्रेम के साथ आरती, पूजा व अभ्यास में इस दिन को व्यतीत करते हैं और अपने भाग्य सराहते हैं।

“मोहि मिल गए रा-धा/धः-स्व-आ-मी पूरे संत।

अब बजत हिये में धुन अनन्त।।”

बसंत के अवसर पर दयालबाग़ में विभिन्न कार्यक्रम जैसे - बेबी शो, फैन्सी ड्रेस शो, जिमनास्टिक्स एवं विभिन्न प्रकार के खेल-कूद के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन सभी कार्यक्रमों में बच्चे, युवा और सभी भाई व बहन उत्साह पूर्वक भाग लेते हैं।

“आज आया बसन्त नवीन।

सखी री खेलो गुरु संग फाग रचाय।।”

बसन्त के शुभ अवसर पर दयालबाग़ एवं देश विदेश की समस्त सतसंग कालोनियों में रात्रि के समय भव्य एवं आकर्षक विद्युत सज्जा की जाती है, जिसके लिए मोमबत्ती या दियों इत्यादि का प्रयोग नहीं किया जाता है जिससे प्रदूषण न हो। सौर ऊर्जा द्वारा LED Lights का प्रयोग विद्युत सज्जा के लिए किया जायेगा।



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