संभा जी महाराज की जयंती पर शत शत नमन



आज छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र धर्मवीर संभाजी महाराज की जन्म जयंती है...धर्मवीर संभाजी महाराज का जन्म आज ही के दिन 14 मई 1657 में पुरंदर के किले में हुआ था..!



वामपंथी इतिहास में भले ही उनकी छवि एक उद्दंड शासक  की बनायीं गयी हो पर उनकी वीरता, उनका बलिदान, हिंदुत्व पर मर मिटने का उनका जज्बा कुछ और ही कहानी कहता है|

वे केवल संकल्पवान ही नहीं, वीर योद्धा और कुशल सेनापति भी थे, जिसका प्रमाण ये तथ्य है कि अपने नौ वर्षो के कम समय के शासन काल में उन्होंने 120 युद्ध किये , और इनमें से एक में भी उनकी सेना पराभूत नहीं हुई ।


छत्रपति बनने के पश्चात् लगातार औरंगजेब, पुर्तगालियो, दक्षिण के मुस्लिम शासकों तथा ईस्ट इण्डिया कंपनी से संघर्ष करने के साथ-साथ हिन्दू साम्राज्य का विस्तार कर संभाजी राजे ने यह सिद्ध कर दिया की वे हिन्दू पदपादशाही के कुशल उत्तराधिकारी हैं।


 पुर्तगालियों को पराजित कर किसी राजनैतिक कारण से वे संगमनेर में रहने लगे थे। जिस दिन वो रायगढ़ के लिए प्रस्थान करने वाले थे, उसी दिन कुछ ग्रामीणों ने अपनी समस्या उन्हें बतानी चाही, जिसके चलते उन्होंने अपने साथ केवल 200 सैनिक रख के बाकी सेना को रायगढ़ भेज दिया। गणोजी शिर्के, जिसको उन्होंने वतनदारी देने से इन्कार किया था, मुग़ल सरदार इलियास खान के साथ गुप्त रास्ते से 5000 की फ़ौज के साथ वहां पहुंचा। यह वह रास्ता था जो सिर्फ मराठों को पता था, इसलिए संभाजी महाराज को कभी नहीं लगा था कि शत्रु इस ओर से भी आ सकेगा। उन्होंने वीरता से लड़ने का प्रयास किया किन्तु इतनी बड़ी फ़ौज के सामने 200 सैनिकों का प्रतिकार काम कर न पाया और अपने मित्र तथा एकमात्र सलाहकार कविकलश के साथ वह 1 फरवरी, 1689 को बंदी बना लिए गए।


मुगलों को उनका सबसे प्रबल शत्रु मिल चुका था। दोनों के मुँह में कपड़ा ठूंसकर घोड़े पर लादकर उन्हें मुग़ल छावनी लाया गया। दोनों को मुसलमान बनाने के लिए औरंगजेब ने कई कोशिशें की, किन्तु वीर पिता के धर्मवीर पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज और कवि कलश ने धर्म परिवर्तन से इनकार कर दिया। इसके बाद शुरू हुआ उनपर अकथनीय अत्याचारों का सिलसिला। मुग़ल छावनी में उन्हें बाँस में बांधकर घसीटा गया और अपमानपूर्वक जुलूस निकाला गया। औरंगजेब ने दोनों की जुबान कटवा दी, आँखों में गरम सलाखें डाल दीं किन्तु छत्रपति शिवाजी महाराज के इस शेर सुपुत्र ने अंत तक धर्म का साथ नहीं छोड़ा।


11 मार्च 1689 हिन्दू नववर्ष के दिन दोनों के शरीर के टुकडे टुकड़े कर के औरंगजेब ने हत्या कर दी। उनका सर भाले की नोक पर रखकर सब जगह घुमाया गया और अपमानित किया गया। ये हत्याकांड इतिहास के वीभत्स हत्याकांडों में माना जाता है। ऐसा कहते है कि हत्या पूर्व औरंगजेब ने छत्रपति संभाजी महाराज से कहा के मेरे 4 पुत्रों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता तो सारा हिन्दुस्थान कब का मुग़ल सल्तनत में समाया होता। उन टुकड़ों को तुलापुर की नदी में फेक दिया तो किनारे रहने वाले लोगों ने वो इकठ्ठा कर के सिल के जोड़ दिए (इन लोगों को आज " शिवले " इस नाम से जाना जाता है), जिस के उपरांत उनका विधिपूर्वक अंतिम संस्कार किया।


औरंगजेब को लगता था कि छत्रपति संभाजी के समाप्त होने के पश्चात् हिन्दू साम्राज्य भी समाप्त हो जायेगा या जब सम्भाजी मुसलमान हो जायेगा तो सारा का सारा हिन्दू मुसलमान हो जायेगा, लेकिन वह नहीं जनता था कि वह वीर पिता का धर्म वीर पुत्र विधर्मी होना स्वीकार न कर मौत को गले लगाएगा। वह नहीं जनता था कि सम्भाजी किस मिट्टी के बना हुए हैं। सम्भाजी मुगलों के लिए रक्त बीज साबित हुये। सम्भाजी की मौत ने मराठों को जागृत कर दिया और सारे मराठा एक साथ आकर लड़ने लगे। यहीं से शुरू हुआ एक नया संघर्ष जिसमें इस जघन्य हत्याकांड का प्रतिशोध लेने के लिए हर मराठा सेनानी बन गया और अंत में मुग़ल साम्राज्य कि नींव हिल ही गयी और हिन्दुओं के एक शक्तिशाली साम्राज्य का उदय हुआ| अंततः औरंगजेब को दक्खन में ही प्राणत्याग करना पड़ा। उसका दक्खन जीतने का सपना इसी भूमि में दफन हो गया।


सम्भाजी का जीवन बहुत अल्प था। केवल 31 वर्ष की आयु में वे चले गए, लेकिन हिंदुत्व के लिए उन्होंने एक ऐसा उदहारण प्रस्तुत किया, जैसा वीरबंदा बैरागी ने किया। इन्हीं धर्मवीरो ने भारत और हिन्दू धर्म की रक्षा की है। आज हमें उनसे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। छत्रपति संभाजी महराज हिन्दू इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हैं।  संभाजी महाराज की वीरता का वर्णन करने वाली एक रचना को यहाँ साझा करने से मैं खुद को नहीं रोक पा रहा हूँ...


देश धरम पर मिटने वाला।

शेर शिवा का छावा था।।

महापराक्रमी परम प्रतापी।

एक ही शंभू राजा था।।

तेज:पुंज तेजस्वी आँखें।

निकल गयीं पर झुका नहीं।।

दृष्टि गयी पण राष्ट्रोन्नति का।

दिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं।।

दोनो पैर कटे शंभू के।

ध्येय मार्ग से हटा नहीं।।

हाथ कटे तो क्या हुआ?।

सत्कर्म कभी छुटा नहीं।।

जिव्हा कटी, खून बहाया।

धरम का सौदा किया नहीं।।

छत्रपति शिवाजी महाराज का बेटा था वह।

गलत राह पर चला नहीं।।

वर्ष तीन सौ बीत गये अब।

शंभू के बलिदान को।।

कौन जीता, कौन हारा।

पूछ लो संसार को।।

कोटि कोटि कंठो में तेरा।

आज जयजयकार है।।

अमर शंभू तू अमर हो गया।

तेरी जयजयकार है।।

मातृभूमि के चरण कमलपर।

जीवन पुष्प चढाया था।।

है दुजा दुनिया में कोई।

जैसा शंभू राजा था......?


धर्मवीर संभाजी महाराज  को उनके जन्मोत्सव पर शत शत नमन..वंदन.. 🙏🚩

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