उत्तराखंड का लोक पर्व फूलदेई





 !!मानव एवं प्रकृति के पारस्परिक संबंधों का ऋतु पर्व फूलदेई!! 


(कमल किशोर डुकलान रूडकी )

फूलदेई लोकपर्व प्रकृति से जुड़ा सामाजिक, सांस्कृतिक, एवं लोक-पारंपरिक त्योहार की एक अनूठी पर्वतीय संस्कृति की त्रिवेणी है। यह पर्व मानव एवं प्रकृति के पारस्परिक संबंधों का ऋतु पर्व है।..... 

 

उत्तराखंड में ऋतुओं के अनुसार कई अनेक लोक पर्व मनाए जाते रहे हैं । यह पर्व जहाँ हमारी संस्कृति को संजोये हुए है वहीं पहाड़ की धार्मिक परंपराओं को भी जिन्दा रखे हुए हैं। इन्हीं खास पर्वो में शामिल एक लोकपर्व है ”फूलदेई पर्व” उत्तराखंड में इस त्योहार की काफी मान्यता है । इस त्योहार को फूल सक्रांति के नाम से भी कहा जाता है,इस पर्व का मानव और प्रकृति से सीधा संबंध है। इस समय चारों ओर हरियाली और नए-नए प्रकार के खिले फूल प्रकृति की खूबसूरती पर चार-चांद लगा देते हैं।

हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र महीने से ही भारतीय नव वर्ष होता है और नववर्ष के स्वागत के लिए खेतों में सरसों के फूल खिलने लगते हैं और पेड़ों में फूल की कोंपलें फूटने लगती हैं। उत्तराखंड में चैत्र मास की संक्रांति अर्थात पहले दिन से ही बसंत आगमन की खुशी में फूलों का त्योहार “फूलदेई” मनाया जाता है , जो कि ऋतुराज बसन्त ऋतु के स्वागत का प्रतीक है। चैत्र के महीने में उत्तराखंड के जंगलों में कई प्रकार के फूल खिलते हैं,ये फूल इतने मनमोहक व सुन्दर होते हैं कि जिनका वर्णन यहाँ शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है।

इस फूल पर्व में गांव में नन्हे-मुन्ने बच्चे प्रातः सूर्योदय के साथ-साथ घर-घर की देहलीज पर रंग बिरंगे फूल को चढ़ाते हुए घर की खुशहाली,सुख-शांति की कामना के गीत गाते हैं अर्थात जिसका यह मतलब है कि हमारा समाज फूलों के साथ नए साल की शुरूआत करें। इसके लिए बच्चों को परिवार के लोग गुड़, चावल व पैसे देते हैं । ज्योतिषियों के मुताबिक यह पर्व पर्वतीय परंपरा में बेटियों की पूजा,समृद्धि का प्रतीक होने के साथ ही “रोग निवारक औषधि संरक्षण” के दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

फूलदेई पर्व के दिन एक मुख्य प्रकार का व्यंजन बनाया जाता है जिसे “सयेई” कहा जाता है। फूलों का यह पर्व कहीं पूरे चैत्र मास तक चलता है,तो कहीं आठ दिनों तक बच्चे रोज फ्योंली, बुरांस और दूसरे स्थानीय रंग बिरंगे फूलों को चुनकर लाते हैं और उनसे सजी फूलकंडी लेकर घोघा माता की डोली के साथ घर-घर की देहरियों में जाकर फूल डालते हैं। भेंटस्वरूप लोग इन बच्चों की थाली में पैसे, चावल, गुड़ इत्यादि चढ़ाते हैं । घोघा माता को ” फूलों की देवी” माना जाता है । फूलों के इस देव को बच्चे ही पूजते हैं। अंतिम दिन बच्चे घोघा माता की बड़ी पूजा करते हैं और इस अवधि के दौरान इकठ्ठे हुए चावल, दाल और भेंट राशि से सामूहिक भोज पकाया जाता है।इस दिन से लोकगीतों के गायन का अंदाज भी बदल जाता है , होली के त्यौहार की खुमारी में डूबे लोग इस दिन से ऋतुरैंण और चैती गायन में डूबने लगते हैं। ढोल-दमाऊ बजाने वाले लोग जिन्हें बाजगी, औली या ढोली कहा जाता है । वे भी इस दिन गांव के हर घर के आंगन में जाकर गीतों गायन करते हैं , जिसके फलस्वरुप उन्हें घर के मुखिया द्वारा चावल, आटा या अन्य कोई अनाज और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है ।

फूलदेई लोकपर्व से प्रकृति ने अपना श्रृंगार करना शुरू किया। इस पर्व में श्रृष्टि ने हमें कोमलता सिखाई है। यह कहा जा सकता है कि अबोध देवतुल्य बचपन ही हमें जीने का मूल मंत्र देता है। 

फूल देई (फूलसंग्राद)की हार्दिक शुभकामनाएँ

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