शिव शक्ति के मिलन का पर्व है शिवरात्रि

 !!महाशिवरात्रि शिव शक्ति का मिलन!!



शिव का अर्थ है कल्याण, भगवान शिव ही सबका कल्याण करने वाले हैं। शिवरात्रि के साथ जब महा शब्द जुड़ जाता है तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।...


भारत को देवभूमि कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास जी द्वारा रचित ग्रंथों और पुराणों में भगवान के अवतार की कथाएं यह प्रमाणित करती हैं कि यह भरतभूमि इतनी पावन है, कि यहां देवता भी अवतार लेने को लालायित रहते हैं। भले ही आज सोने की चिड़िया कहीं जाने वाले देश को घर के ही दलालों ने ही क्यों न नोंच डाला हो परन्तु इस देश का इतिहास हमेशा इसकी स्वर्ण गाथा गाता रहेगा।इस देश का पौराणिक इतिहास आज भी हमारे लिए विशेष महत्व रखता है।

भगवान शिव को प्रलय का देवता कहा गया है। वे बह्म दृष्टि से क्रोधी स्वभाव के होने के कारण बाहर से नारियल की तरह बेहद सख्त और अंदर से बेहद कोमल हैं उसी तरह शिव भी प्रलय के देवता के साथ थोड़ी सी भक्ति से भी बहुत खुश हो जाते हैं। यही वजह है कि शिव सुर और असुर दोनों के लिए समान रूप से पूज्यनीय हैं।

शिव का अर्थ है कल्याण,जो सबका कल्याण करने वाले हैं। शिवरात्रि के साथ महा शब्द जुड़ने पर इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। हिन्दू धर्म में अनेक त्योहार मनाये जाते हैं लेकिन किसी भी त्योहार के आगे महा शब्द नहीं जोड़ा जाता है। हिन्दू धर्म में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है।

भगवान शिव की महाशिवरात्रि प्रिय तिथि है। शिवरात्रि का पर्व शिव और शक्ति के अद्भुत मिलन का महापर्व है। माना जाता है,कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि में भगवान शंकर का ब्रह्मा से रोद्र रूप में अवतरण हुआ था।शिवपुराण में वर्णन आता है,कि भगवान शिव के निष्कल (निराकार) स्वरूप का प्रतीक ‘लिंग’ इसी पावन तिथि की महानिशा में प्रकट होकर सर्वप्रथम ब्रह्मा और विष्णु के द्वारा पूजा गया था। जिस कारण इस तिथि को ‘शिवरात्रि’ के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन माता पार्वती और शिवजी के विवाह की तिथि के रूप में भी पूजा जाता है। कहते हैं इस दिन जो भी भक्तगण दिन-रात निराहार एवं जितेंद्रिय होकर अपनी पूर्ण शक्ति व साम‌र्थ्य द्वारा निश्चल भाव से शिवजी की यथोचित पूजन करते हैं, उन्हें वर्ष पर्यंत शिव-पूजन करने का संपूर्ण फल मात्र महाशिवरात्रि को प्राप्त हो जाता है।

महाशिवरात्रि का पर्व स्वयं परमपिता परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की याद दिलाता है। इस दिन व्रत धारण करने से सभी पाप नाशक शक्तियों का नाश होता है और मनुष्य के अन्दर की हिंसक प्रवृत्ति भी नियंत्रित होती है। निरीह जनों के प्रति दयाभाव उपजता है। कृष्ण चतुर्दशी के स्वामी शिव है इससे इस तिथि का महत्व और बढ़ जाता है वैसे तो शिवरात्रि हर महीने पड़ती है परन्तु फाल्गुन माह की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है।

भारतीय सनातन संस्कृति का प्रतीक प्रत्येक बारह वर्ष में लगने वाले कुंभ में नागा संन्यासियों का शाही स्नान भी महाशिवरात्रि के पर्व से ही प्रारंभ होता है और प्रयाग राज में माघ मेले का समापन महाशिवरात्रि पर होने वाले शाही स्नान के बाद ही होता है।महाशिवरात्रि के दिन से ही होली पर्व की शुरुआत हो जाती है। महादेव को रंग चढ़ाने के बाद ही होलिका की रंग बयार शुरू हो जाती है। बहुत से लोग ईख या बेर भी तब तक नहीं खाते जब तक वे महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को अर्पित नहीं करते हैं।

सिद्ध और योगी महापुरुषों ने शिव के स्वरूप को चिन्मय और उसकी पुष्प में गंध, वायु में स्पर्श,अग्नि में ताप सहजसिद्ध चैतन्य शक्ति को चिन्मय व चैतन्यता संयुक्त रूप में अनुभूत किया है।चिन्मय के बिना चैतन्यता क्रियाशील नहीं हो पाती है और चैतन्यता के अभाव में चिन्मयता अबोधगम्य हो जाता है। चैतन्यता ही वह इक्षण शक्ति है जिसके ‘इ’ कार से संयुक्त होने पर ‘शव’ रूपेण निर्विकल्प-शांत चिन्मय ‘शिव’ के कल्याणकारी स्वरूप में व्यक्त हो उठता है। चिन्मय व चैतन्यता की इक्षण-शक्ति के युग्म से निरूपित हुआ शिव का यह स्वरूप ही सृष्टि का मूल कारक होने के कारण ‘अर्धनारीश्वर’बन गया और भगवान शिव’अर्धनारीश्वर’ कहलाने लगे।

शिव के सहजसिद्ध चित्शक्ति स्वरूप द्वैत भाव के प्रकारांतर विस्तार को पंचधा प्रकृति के रूप में भी स्वीकार किया।उनकी मान्यता में चित्शक्ति से चैतन्यशक्ति,उससे आनंद, इससे इच्छा,ज्ञान तथा अंतत क्रिया ईशान, तत्पुरुष,अघोर,वामदेव व सद्योजात पाँच शक्तियाँ प्रतीकात्मक उद्भूत हुई। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली शिवरात्रि वस्तुतः शिव और शक्ति के महामिलन का अनमोल क्षण है। इसकी प्रामाणिकता शीत से मुक्ति व वसंत के मधुमास की संधि रूप में प्रत्यक्ष अनुभव की जा सकती है।

( कमल किशोर डुकलान रूडकी )

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