शायरों की महफिल


 ग़ज़ल 


उसकी हंसी के पीछे बहुत सिसकियां मिलीं।

लहजे में यार उसके हमें तल्खियां मिलीं।।


यूं इश्क़ में फकत हमें नाकामियां मिलीं।

हमको कदम-कदम पर ही रुसवाइयां मिलीं।।


आई बहार ऐसी झड़ी पत्तियां सभी।

उलझी हुई तमाम हमें गुत्थियां मिलीं।।


खुद को समझ रहे थे बड़ा पाक-साफ हम।

देखा जो आइना तो कई खामियां मिलीं।।


खरगोश को भी जिसने पिछाड़ा था दौड़ में।

पैरों पर आज यारों उसके बेड़ियां मिलीं।।


बरसों के बाद आज मुलाकात फिर हुई।

उनकी अदा में आज भी वो बिजलियां मिलीं।।


अफसर नहीं मिला कभी बाबू नहीं मिला।

खाली पड़ी तमाम हमें कुर्सियां मिलीं।।


जब आदमी से काम नहीं कोई हो सका।

दरबार में खुदा के कई अर्जियां मिलीं।।


दर्द गढ़वाली, देहरादून 

09455485094

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